हरिद्वार: प्रवाहित रामकथा के पांचवें दिन बापू ने कहा कि पूरी पृथ्वी अमृत है और भारत माता परम अमृत है। उन्होंने कहा कि गीता पृथ्वी का अमृत है तथा बुद्धपुरुषों के अधरों से निकला वचन ही वास्तविक अधरामृत है। कथा के प्रारंभ में श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्होंने कहा कि धरती से प्राप्त हर वस्तु अमृत है, लेकिन जब उसका व्यापार होने लगता है तो उसका स्वरूप बदल जाता है। वहीं अधरामृत वह दिव्य वचन है, जिसे बेचा नहीं बल्कि लोककल्याण के लिए बांटा जाता है। उन्होंने कहा कि उपनिषद, भागवत, ब्रह्मसूत्र और व्यासपीठ से निकला वचन अलौकिक अधरामृत है।
बापू ने रामचरितमानस के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसे देखने का दृष्टिकोण व्यक्ति की साधना पर निर्भर करता है। “कुछ लोगों के लिए यह मानस महाकाव्य है, साधुओं के लिए यह महामंत्र है। आपके लिए यह प्रवचन है, मेरे लिए यह स्वाध्याय है।” उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं के लिए रामचरितमानस गुरु है, साधुओं के लिए सद्गुरु है, श्रोताओं के लिए ज्ञान है और वक्ता के लिए यह एक गान है। उन्होंने कहा कि उपनिषद स्वाध्याय और प्रवचन दोनों में प्रमाद न करने का संदेश देते हैं तथा सच्चा वक्ता स्वयं को बोलने वाला नहीं, बल्कि स्वाध्याय करने वाला मानता है।
योग की महिमा बताते हुए बापू ने कहा कि योग भी अमृत है और वियोग भी अमृत है, क्योंकि वियोग के मंथन से प्रेम का अमृत प्रकट होता है। उन्होंने श्वेताश्वतर उपनिषद के मंत्र “श्रुण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः” का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य अमृतस्वरूप और दिव्य आत्मा है। उन्होंने कहा कि समता, पवित्र वातावरण और एकाग्रता योग के लिए आवश्यक हैं तथा योग से शरीर, मन और आत्मा में दिव्यता का संचार होता है। उन्होंने कहा कि “भजन बढ़ाओ, वजन अपने आप कम हो जाएगा।” कथा के दौरान बापू ने शिव चरित्र को कल्याण अमृत, सीताराम चरित्र को सत्य अमृत, भरत चरित्र को प्रेमामृत, हनुमान चरित्र को वैराग्य अमृत और काकभुशुण्डि चरित्र को साधु अमृत बताया।
उन्होंने पंचामृत के आध्यात्मिक स्वरूप की भी व्याख्या करते हुए कहा कि दूध धर्म का, दही साधु के मंथित हृदय का और मधु भजन से प्राप्त मधुरता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस में नयनामृत, वचनामृत, कृपामृत, प्रेमामृत, श्रवणामृत और कथामृत सहित अनेक अमृत स्वरूपों का वर्णन मिलता है। रामकथा के दौरान योगऋषि बाबा रामदेव भी उपस्थित रहे। उन्होंने योग, सनातन परंपरा और बापू के प्रति अपने स्नेह एवं सम्मान को व्यक्त किया। कथा के समापन में बापू ने विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम के वनगमन तथा सीता-राम विवाह का प्रसंग सुनाते हुए बालकांड का समापन किया और पांचवें दिन की कथा को विराम दिया।
